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फसल उत्पादन के लिए जैविक विधि अपनाएं... अथ एंटरटेनमेंट की सार्थल पहल
फिल्म निर्माता पंकज नारायण इसे डोक्यूमेंट्री फिल्म के साथ एक मुहिम मानते हैं जो किसानों के हक में एक चिन्गारी का काम करेगी और फिर एक आंदोलन का शक्ल लेकर पूरे देश में बिगुल बजाएगा और कहेगा- हे किसान जो आज तक ज़हर खेतों में घोला है, उसका असर वर्षों तक तो रहेगा ही, लेकिन अब भी कुछ नहीं बिगड़ा है, आओ लौटें प्रकृति की ओर जिससे हम सबने खिलवाड़ किया है। ये प्रकृति हमें क्षमा जरूर करेगी और हम जैविक खाद का इस्तेमाल कर एक स्वस्थ और समृद्ध भारत का निर्माण करेंगे।
आजकल सब्जी खाएं या फल, हर चीज में घुला है जहर
जैविकता से दूर होकर और ज़हर को जिंदगी बनाकर हमने इस जीवनदायिनी प्रकृति का क्या हश्र कर रखा है। हमारे किसान भाइयों को इतना दिग्भ्रमित कर दिया गया है कि वो चाहे सब्जी हो या फल, हर कुछ पेस्ट्रीसाइट के अत्यधिक इस्तेमाल से उपज रहा है जो खेतों की उर्वराशक्ति को धीरे-धीरे कम करने के साथ पर्यावरण को भी प्रभावित करता है। प्रभावित ऐसा-वैसा नहीं, हवा में जहर घोल रहा है। आजकल अनुवांशिक रोगों के अलावा नई पीढ़ियों में जो नई-नई बीमारियां आ रही हैं, उसका भी जवाब इसी से मिलता है। इसी का परिणाम है कि बच्चे समय से पहले पैदा हो जाते हैं, बच्चे कम वजन पर जन्म लेते हैं और आज कई तरह के कैंसर लाखों जिंदगियों को लील रहे हैं।
कीटनाशकों के ही प्रयोग से बढ़ रहा कुपोषण, लाखों बच्चे गंवा चुके जान
एक आंकड़े की मानें तो भारत में हर वर्ष 31 लाख बच्चे की मृत्यु पांच वर्ष से कम उम्र में ही हो जाती हैं। देश-प्रदेश में कुपोषण के ऐसे दर्दनाक दृश्य उन नुमांईदों को शर्मसार करने के लिये काफी है, जो कोठियों से आर्थिक विकास की तस्वीर दिखाने की कोशिश करते है और किसानों को साहूकारों के कर्ज से मुक्ति दिलाने के बहाने आधुनिक बाजारवाद का मंत्र देकर चंद कागजी नोटों की खातिर इस देश को ही ज़हर के हवाले कर रहे हैं। बीमारियां दस्तक तो दे रही हैं, लेकिन हमें तो फुर्सत ही नहीं, इन घुलते ज़हर पर पारखी नज़र अपनाने की। ये घुलता ज़हर एक साजिश का हिस्सा है- हमारी देश की कृषि व्यवस्था को बेपटरी करने के लिए। पर्यावरण का संतुलन बिगाड़ने के लिए। अर्थव्यवस्था को तबाह करने के लिए। ये साजिश है कि पहले किसानों को पैदावार इतनी दे दो कि उन्हें जहरीले रसायनों को भी खरीदना पड़े तो खरीद ले और मालामाल हो जाए और फिर उनकी सोने सी जमीन को कुछ ही माह में सूखा दो, फिर बंजर बना दो जिसमें मिट्टी तो नजर आए, मगर पत्थर जैसी कड़ी, कुछ फसल हो तो वो भी ज़हर से सनी, किसान तो रहे मगर कर्ज से बेहाल, रास्ता निकले तो बस एक- किसानों की आत्महत्या। इसके अलावा गिद्ध और उल्लू जैसे प्रकृति की रक्षा करने वाले महत्वपूर्ण पशु-पक्षी जहरीले कीटनाशकों के छिड़काव से छटपटाकर दम तोड़ दें। डोक्यूमेंट्री फिल्म 'कीटनाशक' में बताया गया है कि कैसे इन सारे रासायनों के पीछे बाजार में एक माफियाओं का चेन काम कर रहा है। लेकिन जरूरत हमें सावधान होने की है।
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