एक आंकड़े की मानें तो भारत में हर वर्ष 31 लाख बच्चे की मृत्यु पांच वर्ष से कम उम्र में ही हो जाती हैं। देश-प्रदेश में कुपोषण के ऐसे दर्दनाक दृश्य उन नुमांईदों को शर्मसार करने के लिये काफी है, जो कोठियों से आर्थिक विकास की तस्वीर दिखाने की कोशिश करते है और किसानों को साहूकारों के कर्ज से मुक्ति दिलाने के बहाने आधुनिक बाजारवाद का मंत्र देकर चंद कागजी नोटों की खातिर इस देश को ही ज़हर के हवाले कर रहे हैं। बीमारियां दस्तक तो दे रही हैं, लेकिन हमें तो फुर्सत ही नहीं, इन घुलते ज़हर पर पारखी नज़र अपनाने की। ये घुलता ज़हर एक साजिश का हिस्सा है- हमारी देश की कृषि व्यवस्था को बेपटरी करने के लिए। पर्यावरण का संतुलन बिगाड़ने के लिए। अर्थव्यवस्था को तबाह करने के लिए। ये साजिश है कि पहले किसानों को पैदावार इतनी दे दो कि उन्हें जहरीले रसायनों को भी खरीदना पड़े तो खरीद ले और मालामाल हो जाए और फिर उनकी सोने सी जमीन को कुछ ही माह में सूखा दो, फिर बंजर बना दो जिसमें मिट्टी तो नजर आए, मगर पत्थर जैसी कड़ी, कुछ फसल हो तो वो भी ज़हर से सनी, किसान तो रहे मगर कर्ज से बेहाल, रास्ता निकले तो बस एक- किसानों की आत्महत्या। इसके अलावा गिद्ध और उल्लू जैसे प्रकृति की रक्षा करने वाले महत्वपूर्ण पशु-पक्षी जहरीले कीटनाशकों के छिड़काव से छटपटाकर दम तोड़ दें। डोक्यूमेंट्री फिल्म 'कीटनाशक' में बताया गया है कि कैसे इन सारे रासायनों के पीछे बाजार में एक माफियाओं का चेन काम कर रहा है। लेकिन जरूरत हमें सावधान होने की है।
कीटनाशकों के ही प्रयोग से बढ़ रहा कुपोषण, लाखों बच्चे गंवा चुके जान
04:01
Apoorva Bajaj
Ath Entertainment
Indian Film maker
Keetnashak
Pankaj Narayan
अपूर्वा बजाज
कीटनाशक
पंकज नारायण
एक आंकड़े की मानें तो भारत में हर वर्ष 31 लाख बच्चे की मृत्यु पांच वर्ष से कम उम्र में ही हो जाती हैं। देश-प्रदेश में कुपोषण के ऐसे दर्दनाक दृश्य उन नुमांईदों को शर्मसार करने के लिये काफी है, जो कोठियों से आर्थिक विकास की तस्वीर दिखाने की कोशिश करते है और किसानों को साहूकारों के कर्ज से मुक्ति दिलाने के बहाने आधुनिक बाजारवाद का मंत्र देकर चंद कागजी नोटों की खातिर इस देश को ही ज़हर के हवाले कर रहे हैं। बीमारियां दस्तक तो दे रही हैं, लेकिन हमें तो फुर्सत ही नहीं, इन घुलते ज़हर पर पारखी नज़र अपनाने की। ये घुलता ज़हर एक साजिश का हिस्सा है- हमारी देश की कृषि व्यवस्था को बेपटरी करने के लिए। पर्यावरण का संतुलन बिगाड़ने के लिए। अर्थव्यवस्था को तबाह करने के लिए। ये साजिश है कि पहले किसानों को पैदावार इतनी दे दो कि उन्हें जहरीले रसायनों को भी खरीदना पड़े तो खरीद ले और मालामाल हो जाए और फिर उनकी सोने सी जमीन को कुछ ही माह में सूखा दो, फिर बंजर बना दो जिसमें मिट्टी तो नजर आए, मगर पत्थर जैसी कड़ी, कुछ फसल हो तो वो भी ज़हर से सनी, किसान तो रहे मगर कर्ज से बेहाल, रास्ता निकले तो बस एक- किसानों की आत्महत्या। इसके अलावा गिद्ध और उल्लू जैसे प्रकृति की रक्षा करने वाले महत्वपूर्ण पशु-पक्षी जहरीले कीटनाशकों के छिड़काव से छटपटाकर दम तोड़ दें। डोक्यूमेंट्री फिल्म 'कीटनाशक' में बताया गया है कि कैसे इन सारे रासायनों के पीछे बाजार में एक माफियाओं का चेन काम कर रहा है। लेकिन जरूरत हमें सावधान होने की है।

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