पंकज नारायण की भावनाओं को बयां करते, उनके द्वारा लिखे ये शब्द-साधना

 
 
जब-जब लगा कि मेरी हर बात एक रचना है, तब-तब दाहिने गाल पर किसी गरीब आदमी के थप्पड़ से बना भारत का नक्शा महसूस किया। दादा जी कहते थे- बेटा, तुम्हारी हर बात एक रचना हो न हो, पर हर रचना में एक बात हो और जब सुनसान सड़क पर चलो तो उस समय तुम्हारी कोई औकात होः पंकज नारायण
जब रात में दिमाग़ का शोर थोड़ा कम होता है तो मेरे भीतर एक तनहा शहर चादर तान के सो जाता है। तब मेरा गांव रात भर जागता रहता है मेरे सपनों में, रखवाली करता है मेरी नींद की । शहरों की तरह गांव अपनी तारीख नहीं बदलता। शहर की कुछ तारीखें गांव को बदल देती हैं। मेरे साथ इसके कारण एक अच्छा समीकरण घटित हुआ। गांव ने मुझे शहर पहुंचा दिया और शहर ने अपना बदला लेकर मुझे गांव बना दिया। पंकज नारायण


रहस्य को खोलती ज़ुबां हमेशा ज़मीन से निकलती है, नई फसल की तरह। नई फसल सपनों की नमी से निकलती है, एक औरत की तरह। एक औरत निकलती है एक औरत से ही, पिछली सदी की तरह। पिछली सदी निकलती है मां की आंखों से मेरी तरह। पंकज नारायण


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