आज की फिल्में जहां एक ओर मनोरंजनपरक हैं, वहीं
एक भावपूर्ण पहलू को पीछे छोड़ती जा रही हैं। उसकी सबसे बड़ी वजह है कि मौजूदा
फिल्में जरूरत से अधिक व्यवसायिक तौर पर बनाई जा रही हैं। उनमें वो पहलू कहीं-न-कहीं
काफी कम दिखाई दे रहा है, जिन्हें आज भी दर्शकों और समाज का बहुत बड़ा हिस्सा
देखना चाह रहा है। फिल्में व्यवसायिक तो होती हैं, लेकिन समाज का आईना भी कहीं
जाती हैं। इसलिए उन स्तंभों को भूलना आधुनिकता के नाम पर समाज के साथ बेइमानी ही
तो है।
फिल्म की मौजूदा हालत बहस का मुद्दा बन चुका है। ऐसे
में फिल्म निर्माता पंकज नारायण और अथ एंटरटेनमेंट की निदेशक अपूर्वा बजाज ने जिस
शिद्दत के साथ फिल्म इंडस्ट्री में पदार्पण किया है और शुरुआत से ही सामाजिक मसलों
को उठाना प्राथमिक कार्यों में शुमार किया है, उसकी जितनी तारीफ करें कम है। पंकज नारायण ने डोक्यू ‘कीटनाशक’, गंगा अवतरण में
प्रस्तुति के लिए काव्य लेखन कर एक नया आगाज किया है। पंकज का मानना भी है कि वो
आगे भी जो फिल्म बनाएंगे, उसमें समाज को देखना उनकी पहली प्राथमिकता होगी। यही
कारण है कि उनकी हाल में रिलीज होने वाली फिल्म ‘चल गुरु हो जा शुरू’ भी पाखंडी बाबाओं पर आधारित है।

EmoticonEmoticon